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संविधान में संशोधन 61-80

संविधान में संशोधन 61-80

संविधान में समय-समय पर आवश्यकता होने पर संशोधन भी होते रहे हैं। विधायिनी सभा में किसी विधेयक में परिवर्तन, सुधार अथवा उसे निर्दोष बनाने की प्रक्रिया को 'संशोधन' कहा जाता है। भारतीय संविधान का संशोधन भारत के संविधान में परिवर्तन करने की प्रक्रिया है। इस तरह के परिवर्तन भारत की संसद के द्वारा किये जाते हैं। इन्हें संसद के प्रत्येक सदन से पर्याप्त बहुमत के द्वारा अनुमोदन प्राप्त होना चाहिए और विशिष्ट संशोधनों को राज्यों के द्वारा भी अनुमोदित किया जाना चाहिए।

61. संविधान (61वां संशोधन) अधिनियम, 1989- 

इस अधिनियम के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 326 का संशोधन करके मताधिकार की आयु 21 से घटकर 18 वर्ष कर दी गई, ताकि देश के उस युवा-वर्ग को जिसे अभी तक कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया था, अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर मिल सके और वे राजनीतिक प्रक्रिया का अंग बन सकें ।

62. संविधान (62वां संशोधन) अधिनियम, 1989-

 संविधान के अनुच्छेद-334 में यह प्रावधान है कि अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की सीटों के आरक्षण तथा लोकसभा और विधान सभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रतिनिधित्व से संबंधित व्यवस्था संविधान में लागू होने के 40 वर्ष बाद समाप्त हो जाएगी । हालांकि अनुसूचित जातियों और जनजातियों ने गत 40 वर्षों में पर्याप्त प्रगति की है, किंतु संविधान सभा के सामने इस तरह की व्यवस्था बनाते समय जो कारण थे, वे अभी बरकरार हैं । इस अधिनियम के द्वारा अनुच्छेद-334 को संशोधित करके यह व्यवस्था की गई कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों का आरक्षण और आंग्ल-भारतीय समुदाय का मनोनयन द्वारा प्रतिनिधित्व अगले 10 वर्षों तक जारी रहेगा ।

63. संविधान (63वां संशोधन) अधिनियम, 1989- 

संविधान (59वां संशोधन) अधिनियम मार्च 1988 में लागू किया गया, जिससे पंजाब में आपात स्थिति की घोषणा और राज्य में राष्ट्रपति शासन की अवधि के संबंध में कुछ परिवर्तन किए गए थे । इस पर पुनर्विचार करने पर सरकार ने निर्णय किया कि संशोधन में पंजाब में आपात स्थिति की घोषणा के संबंध में जिस विशेष अधिकारों की व्यवस्था की गई थी, उनकी अब जरूरत नहीं रही । तद्नुसार, अनुच्छेद-356 की धारा 5 तथा अनुच्छेद-359(क) को हटा दिया गया है ।

64. संविधान (64वां संशोधन) अधिनियम, 1990- 

इस अधिनियम के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 356 की धारा 4 व 5 के अंतर्गत संविधान के अनुच्छेद-356 की धारा 1 के तहत् पंजाब के संबंध में ई. 1987 को संशोधित की गई घोषणा की अवधि को साढ़े तीन वर्ष के लिए और बढ़ा दिया गया ।

65. संविधान (65वां संशोधन) अधिनियम, 1990- 

संविधान के अनुच्छेद-338 में एक विशेष अधिकारी का प्रावधान है, जो संविधान के तहत् अनुसूचित जातियों और जनजातियों के हितों से संबंधित मामलों की जांच करेगा और इस संबंध में राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट भेजेगा । यह अनुच्छेद संशोधित कर दिया गया है जिसमें अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग के गठन की व्यवस्था की गई है, जिसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष तथा पांच अन्य सदस्य होंगे, जिन्हें राष्ट्रपति अपनी मुहर से नियुक्त करेंगे । संशोधित अनुच्छेद में आयोग के कार्यों के बारे में विस्तार से बताया गया है और उसके उन कदमों के बारे में भी बताया गया है, जो उसे केंद्र अथवा राज्य सरकार को कमीशन की रिपोर्ट के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उठाने होंगे । इसमें यह भी व्यवस्था की गई है कि आयोग के पास शिकायत पर की जाने वाली जांच के दौरान वे सभी अधिकार होंगे, जो कि एक न्यायिक अदालत को होते हैं और आयोग की रिपोर्ट संसद और राज्य विधान सभाओं के समक्ष रखी जाएगी ।

66. संविधान (66वां संशोधन) अधिनियम, 1990- 

इस अधिनियम के तहत् भूमि सुधार तथा कृषिभमि की सीमा से संबंधित राज्य सरकारों के उन 55 नियमों को संविधान की नौंवी अनसची में शामिल तथा सुरक्षित कर दिया गया है, जिन्हें आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, चेन्नई, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के प्रशासन ने इस आशय से बनाया था कि इन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी ।

67. संविधान (67वां संशोधन) अधिनियम, 1990- 

संविधान के 64वें संशोधन के तहत् पंजाब के संबंध में 11 मई, 1987 को की गई तीन वर्ष की अवधि की घोषणा को साढ़े तीन वर्ष किया था । 67वें संशोधन के तहत् अनुच्छेद-356 की धारा 4 को पुनः संशोधित करके इस अवधि को बढ़ाकर चार वर्ष कर दिया गया है ।

68. संविधान (68वां संशोधन) अधिनियम, 1991- 

संविधान के 67वें संशोधन के तहत् पंजाब के संबंध में 17 मई, 1987 को की गई घोषणा को बढ़ाकर चार वर्ष किया गया था । 68वें संशोधन के तहत् अनुच्छेद-356 की धारा 4 को संशोधित करके इस अवधि को बढ़ाकर पांच वर्ष कर दिया गया है ।

69. संविधान (69वां संशोधन) अधिनियम, 1991-

 भारत सरकार ने 24 दिसंबर, 1987 को दिल्ली के प्रशासन से संबंधित विभिन्न मामलों का अध्ययन करने तथा प्रशासनिक ढांचे को चुस्त बनाने के उपाय सुझाने के लिए एक कमेटी गठित की थी । पूरी जांच-पड़ताल और अध्ययन के बाद इस समिति ने यह सिफ़ारिश की थी कि दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश बना रहे और इसमें एक विधानसभा तथा एक मंत्रिपरिषद भी हो, जो आम आदमी से संबंधित मामलों के बारे में पूरी तरह से अधिकार संपन्न हो । कमेटी ने सिफ़ारिश की थी कि स्थायित्व और सुदृढ़ता को दृष्टि में रखते हुए ऐसी व्यवस्था की जाए, जिससे राष्ट्रीय राजधानी को अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की तुलना में एक विशेष दर्जा प्राप्त हो । यह अधिनियम उपर्यक्त सिफ़ारिशों को लागू करने के लिए पारित किया गया ।

70. संविधान (70वां संशोधन) अधिनियम, 1992- 

संविधान (74वें संशोधन) विधेयक, 1991 और राष्ट्रीय राजधानी सीमा क्षेत्र सरकार, विधेयक 1991 पर संसद के दोनों सदनों में विचार प्रकट करते समय केंद्र शासित प्रदेशों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों को भी संविधान के अनुच्छेद-54 के अंतर्गत राष्ट्रपति के चुनाव के लिए निर्वाचनमंडल में शामिल करने के पक्ष में विचार प्रकट किए गए ।
इस समय राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित अनुच्छेद-54 में निर्वाचनमंडल के लिए केवल निर्वाचित संसद सदस्यों और राज्यों के विधानसभा सदस्यों (इसमें केंद्र शासित प्रदेश शामिल नहीं है) को शामिल करने का प्रावधान है । इसी प्रकार अनुच्छेद-55 में इस प्रकार के चुनाव के तरीके के लिए राज्यों की विधान सभाओं की भी बात की गई है ।
अनुच्छेद-54 में शामिल की गई एक व्याख्या के अनुसार अनुच्छेद-54 और 55 में राज्य के संदर्भ में इस बात का प्रावधान किया गया कि इसमें राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचनमंडल में राष्ट्रीय राजधानी सीमा क्षेत्र दिल्ली और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी को भी शामिल किया जाएगा । इससे अनुच्छेद-239ए के प्रावधानों के तहत् केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के लिए बनाई गई विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों और अनुच्छेद-239एए के अंतर्गत राष्ट्रीय राजधानी सीमा क्षेत्र दिल्ली की प्रस्तावित विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों को भी निर्वाचनमंडल में शामिल किया जा सकेगा ।

71. संविधान (71वां संशोधन) अधिनियम, 1992- 

संविधान की आठवीं अनुसूची में कुछ और भाषाएं जोड़ने की मांग चल रही थी । इस अधिनियम से संविधान की आठवीं अनुसूची में संशोधन करके इसमें कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषाओं को शामिल किया गया है ।

72. संविधान (72वां संशोधन) अधिनियम, 1992-

 त्रिपुरा राज्य में जहां गड़बड़ी का माहौल बना हुआ है, शांति और सद्भाव कायम करने के लिए गत 12 अगस्त, 1988 को भारत सरकार और नेशनल वालेंटियर्स त्रिपुरा के बीच एक समझौते को लागू करने के लिए संविधान (72वां संशोधन) अधिनियम, 1972 के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद-332 में संशोधन किया गया है, ताकि त्रिपुरा राज्य विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या निर्धारित करने के लिए तब तक के लिए अस्थाई व्यवस्था की जा सके, जब तक कि संविधान के 170वें अनुच्छेद के अंतर्गत वर्ष 2000 के बाद प्रथम जनगणना के आधार पर सीटों का तालमेल न हो जाए ।

73. संविधान (73वां संशोधन) अधिनियम, 1993-

 संविधान के अनुच्छेद-40 में सुरक्षित किए गए राज्यों के नीति निर्देशक सिद्धांतों में से एक में यह कहा गया है कि राज्यों को ग्राम पंचायतों का गठन करने और उन्हें वे सभी अधिकार प्रदान करने के लिए क़दम उठाने चाहिए, जो उन्हें एक स्वायत्तशासी सरकार की इकाइयों के रूप में काम करने के लिए आवश्यक हैं ।
इसके आलोक में पंचायतों से जुड़ा एक नया भाग IX संविधान में जोड़ा गया है । इसका उद्देश्य अन्य चीजों के अलावा, एक गांव में अथवा गांवों के समूह में ग्रामसभा स्थापित करना, गांव के स्तर पर तथा अन्य स्तरों पर पंचायतों का गठन करना, गांव और उसके बीच के स्तर पर पंचायतों की सभी सीटों के लिए सीधे चुनाव करना, ऐसे स्तरों पर पंचायतों के यदि सरपंच हैं तो उनका चुनाव कराना, पंचायतों में सदस्यता के लिए और सभी स्तरों पर पंचायत के पदाधिकारियों के चुनाव के लिए जनसंख्या के आधार पर अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण, महिलाओं के लिए कम-से कम एक-तिहाई सीटों का आरक्षण, पंचायतों के लिए पांच साल की कार्यवधि तय करना और यदि कोई पंचायत भंग हो जाती है तो छह महीने के भीतर उसका चुनाव कराने की व्यवस्था करना है ।

74. संविधान (74वां संशोधन) अधिनियम, 1993- 

विभिन्न कारणों से अनेक राज्यों के स्थानीय निकाय कमजोर और बेअसर हो गए हैं । इनमें नियमित चुनाव न होना, लंबे समय तक भंग रहना और कर्तव्यों तथा अधिकारों का समुचित हस्तांतरण न होना शामिल हैं । इसके परिणामस्वरूप, शहरी स्थानीय निकाय एक स्वायत्तशासी सरकार की जीवंत लोकतांत्रिक इकाई के रूप में कारगर ढंग से काम नहीं कर पा रहे हैं ।
इन खामियों को देखते हुए संविधान में पालिकाओं के संबंध में एक नया भाग 9 ए शामिल किया गया है, ताकि अन्य चीजों के अलावा निम्नलिखित प्रावधान किए जा सकें: तीन तरह की पालिकाओं का गठन, जैसे कि ग्रामीण से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रहे क्षेत्रों के लिए नगर पंचायतों, छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए नगर परिषदें और बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए नगर निगम ।

75. संविधान (75वां संशोधन) अधिनियम, 1994- 

इन दिनों विभिन्न राज्यों में जो किराया नियंत्रण कानून लागू हैं, उनमें कई खामियां हैं, जिनके कारण अनेक अवांछनीय परिणाम हो रहे हैं । किराया नियंत्रण कानूनों के कुछ वैधानिक दुष्परिणाम हैं- लगातार बढ़ती हुई मुकदमेबाजी, न्यायालयों द्वारा समय पर न्याय न दे पाना, किराया नियंत्रण कानूनों से बचने के तरीके निकालना और किराए के लिए मिल सकने वाले मकानों की निरंतर कमी ।
उच्चतम न्यायालय ने देश में किराया नियंत्रण कानूनों की अनिश्चित और तर्करहित स्थिति को ध्यान में रखते हुए प्रभाकरण नय्यर और अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य (सिविल रिट पेटीशन संख्या 506 ऑफ 1986) तथा अन्य रिट याचिकाओं के संर्दभ में यह विचार प्रकट किया था कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को किराया विवादों के जबर्दस्त भार से मुक्त कर दिया जाना चाहिए । इन मुकदमों में अपील करने के अवसर कम कर दिए जाने चाहिए । किराया नियंत्रण कानून, सरल, विवेकपूर्ण और स्पष्ट होने चाहिए । मुकदमेबाजी जल्दी ही अवश्य समाप्त हो जानी चाहिए ।
इस कानून द्वारा संविधान के भाग 14(क) के अनुच्छेद-323(ख) में संशोधन किया गया है ताकि किराएदारों और मकान मालिकों को समय पर राहत मिल सके । इस संशोधन में राज्य स्तर पर किराया नियंत्रण न्यायाधिकरण स्थापित करने और अन्य सभी अदालतों में मकान मालिक-किराएदार से संबंधित मुकदमे दायर करने पर रोक लगाने की व्यवस्था है । इस व्यवस्था के कारण से मुकदमों के फैसलों की अपील संविधान के अनुच्छेद-136 के तहत् केवल उच्चतम न्यायालय में की जा सकेगी ।

76. संविधान (76वां संशोधन) अधिनियम, 1994-

 पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए शिक्षा संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में स्थान आरक्षित करने की नीति का लंबा इतिहास 1921 में तमिलनाडु से शुरू हुआ था । राज्य सरकार अधिकांश लोगों की आवश्यकता के अनुरूप आरक्षित स्थानों की संख्या समय-समय पर बढ़ती रही । अब आरक्षित स्थानों की संख्या बढ़कर 69 प्रतिशत हो गई है-18 प्रतिशत अनुसूचित जातियां, एक प्रतिशत अनुसूचित जनजातियां और 50 प्रतिशत अन्य पिछड़े वर्ग ।
उच्चतम न्यायालय ने इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत सरकार और अन्य (एआईआर 1993 एससी 477) में 16 नवंबर, 1992 को फैसला दिया कि अनुच्छेद-16(4) के अधीन कुल आरक्षित स्थानों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए ।
तमिलनाडु सरकार ने तमिलनाडु पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों (शिक्षा संस्थाओं में स्थान और राज्य के अधीन नौकरियां या पद आरक्षण) विधेयक 1993 पारित कर, इसे संविधान के अनुच्छेद-31सी की व्यवस्थाओं के अनुसार भारत के राष्ट्रपति के विचारार्थ भारत सरकार के पास भेजा । भारत सरकार ने राज्य सरकार के इस कानून की व्यवस्थाओं का अनुमोदन किया और राष्ट्रपति ने तमिलनाडु के इस विधेयक को स्वीकृति दे दी । इस निश्चय के परिणास्वरूप यह जरूरी था कि 1994 के तमिलनाडु कानून, 45 को संविधान की नौवीं अनुसूची की परिधि में लाया जाए, ताकि संविधान के अनुच्छेद-31बी के अधीन न्यायालयों द्वारा विचार न कर सकने के बारे में इस कानून को संरक्षण मिल सके ।

77. संविधान (77वां संशोधन) अधिनियम, 1995- 

अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लोगों को 1955 से ही पदोन्नतियों में आरक्षण की सुविधा मिल रही है । लेकिन इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत सरकार और अन्य के मुकदमे में 16 नवंबर, 1992 को उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि संविधान के अनुच्छेद-16(4) के अंतर्गत नियुक्तियों अथवा पदों का आरक्षण केवल शुरू में की जाने वाली नियुक्ति पर लागू होता है तथा इसे पदोन्नतियों के मामले में आरक्षण पर लागू नहीं किया जा सकता है । उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से अनुसूचित जाति और जनजाति के हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा । चूंकि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का राज्य की नौकरियों में प्रतिनिधित्व अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है जिस स्तर पर होना चाहिए था, अतः अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए पदोन्नति में आरक्षण प्रदान करने की वर्तमान छूट को जारी रखना आवश्यक है । अनुसूचित जाति और जनजाति के हितों की रक्षा के प्रति सरकार की वचनबद्धता को देखते हुए सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए पदोन्नतियों में आरक्षण की वर्तमान नीति को जारी रखने का फैसला किया है । इसके लिए यह आवश्यक था कि संविधान के अनुच्छेद-16 में एक नई धारा (4ए) जोड़कर उसमें संशोधन किया जाए, ताकि अनुसूचित जाति और जनजाति को पदोन्नतियों में आरक्षण प्रदान किया जा सके ।

78. संविधान (78वां संशोधन) अधिनियम, 1995- 

संविधान का अनुच्छेद-31बी नौवीं अनुसूची में शामिल उन कानूनों को इस आधार पर कानूनी चुनौती देने से संवैधानिक छूट प्रदान करता है कि इससे संविधान के खंड-3 में सुरक्षित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है । इस अनुसूची में विभिन्न राज्यों की सरकारों और केंद्रीय सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों की सूची है, जो अन्य चीजों के अलावा भूमि-सहित संपत्ति के हितों और अधिकारों को प्रभावित करती है ।
पहले जब कभी यह महसूस किया गया कि जिन प्रगतिशील कानूनों की परिकल्पना जनता के हित में गई है, उन्हें मुकदमेबाजी का ख़तरा है तो उसके लिए नौवीं अनुसूची का सहारा लिया गया । तदनुसार, भूमि सुधारों और कृषि योग्य भूमि की हदबंदी से संबंधित विभिन्न राज्यों के कानूनों को पहले ही नौंवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया है । चूंकि सरकार भूमि सुधारों को महत्व देने के प्रति वचनबद्ध है, अत: भूमि सुधार कानूनों को नौंवीं अनुसूची में शामिल करने का फैसला लिया गया, ताकि उन्हें अदालतों में चुनौती न दी जा सके । बिहार, कर्नाटक, केरल, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने भूमि से संबंधित अपने कानूनों को नौवीं अनुसूची में शामिल करने का सुझाव दिया है ।
चूंकि उन कानूनों में संशोधन को, जो पहले ही नौंवी अनुसूची में शामिल हैं, कानूनी चुनौती से स्वतः छूट नहीं मिली हुई है, अतः नौंवीं अनुसूची में कुछ मूलभूत कानूनों के साथ-साथ अनेक संशोधित कानूनों को भी शामिल किया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लागू होने पर ये कानून मुकदमेबाजी से प्रभावित नहीं होंगे ।

79. संविधान (79वां संशोधन) अधिनियम, 1999- 

इस कानून द्वारा सरकार ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों तथा आंगल-भारतीयों के लिए लोकसभा और विधान सभाओं में आरक्षण दस वर्षों के लिए बढ़ा दिया है ।

80. संविधान (80वां संशोधन) अधिनियम, 2000- 

दसवें वित्त आयोग की सिफरिशों के आधार पर संविधान (80वां संशोधन) अधिनियम-2000 में केंद्र और राज्यों के बीच करों से एकत्र राजस्व बांटने के बारे में वैकल्पिक योजना पर अमल करने की व्यवस्था की गई है । इस योजना के अनुसार आयकर, उत्पाद शुल्कों, विशेषतः उत्पाद शुल्कों तथा रेल यात्री किरायों पर कर के बदले अनुदानों के लिए अब तक राज्य सरकारों को केंद्रीय करों तथा शुल्कों से एकत्र कुल राजस्व का जितना हिस्सा मिलता था अब उसके स्थान पर 26 प्रतिशत भाग राज्यों को दिया जाएगा ।

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