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संविधान में संशोधन 41-60

संविधान में संशोधन 41-60

संविधान में समय-समय पर आवश्यकता होने पर संशोधन भी होते रहे हैं। विधायिनी सभा में किसी विधेयक में परिवर्तन, सुधार अथवा उसे निर्दोष बनाने की प्रक्रिया को 'संशोधन' कहा जाता है। भारतीय संविधान का संशोधन भारत के संविधान में परिवर्तन करने की प्रक्रिया है। इस तरह के परिवर्तन भारत की संसद के द्वारा किये जाते हैं। इन्हें संसद के प्रत्येक सदन से पर्याप्त बहुमत के द्वारा अनुमोदन प्राप्त होना चाहिए और विशिष्ट संशोधनों को राज्यों के द्वारा भी अनुमोदित किया जाना चाहिए।

41. संविधान (41वां संशोधन) अधिनियम, 1976- 

इस अधिनियम के द्वारा अनुच्छेद-316 में संशोधन करके राज्य लोक सेवा और संयुक्त लोक सेवा आयोगों के सदस्यों की सेवा-निवृत्ति की आयु को 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दिया गया


42. संविधान (42वां संशोधन) अधिनियम, 1976- 

इस अधिनियम द्वारा संविधान में अनेक महत्वपूर्ण संशोधन किए गए । ये संशोधन मुख्यतः स्वर्णसिंह आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए थे ।
कुछ महत्वपूर्ण संशोधन समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्र की अखंडता के उच्चादर्शों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने, नीति निर्देशक सिद्धांतों को अधिक व्यापक बनाने और उन्हें उन मूल अधिकारों, जिनकी आड़ लेकर सामाजिक-आर्थिक सुधारों को निष्फल बनाया जाता रहा है, पर वरीयता देने के उद्देश्य से किए गए । इस संशोधनकारी अधिनियम द्वारा नागरिकों के मूल कर्त्तव्यों के संबंध में एक नया अध्याय जोड़ा गया और समाज विरोधी गतिविधियों से चाहे वे व्यक्तियों द्वारा हों या संस्थाओं द्वारा, निपटने के लिए विशेष उपबंध किए गए । कानूनों की संवैधानिक वैधता से संबंधित प्रश्नों पर निर्णय लेने के लिए न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या निर्धारित करने तथा किसी कानून को संवैधानिक दृष्टि से अवैध घोषित करने के लिए कम-से-कम दो तिहाई न्यायाधीशों की विशेष बहुमत व्यवस्था करके न्यायापालिका संबंधी उपबंधों में भी संशोधन किया गया ।
उच्च न्यायालयों में अनिर्णित मामलों की बढ़ती हुई संख्या को कम करने के लिए और सेवा, राजस्व, सामाजिक-आर्थिक विकास और प्रगति के संदर्भ में कतिपय अन्य मामलों के शीघ्र निपटारे को सुनिश्चित करने के लिए इस संशोधनकारी अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद-136 के अधीन ऐसे मामलों में उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को सुरक्षित रखते हुए प्रशासनिक और अन्य न्यायाधिकरणों के गठन के लिए उपबंध किया गया । अनुच्छेद-226 के अधीन उच्च न्यायालयों के रिट अधिकार क्षेत्र में भी कुछ संशोधन किया गया ।

43. संविधान (43वां संशोधन) अधिनियम,1977- 

इस अधिनियम के द्वारा अन्य बातों के साथ-साथ, संविधान (42वां संशोधन) अधिनियम, 1976 के लागू होने से उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में जो कटौती हो गई थी, उसे बहाल करने का उपबंध किया गया और तदनुसार उक्त संशोधन द्वारा संविधान में शामिल किए गए अनुच्छेद-32क, 131क, 144क, 226क और 228क को इस अधिनियम द्वारा हटा दिया गया । इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-31 को भी, जिसके द्वारा राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के कतिपय कानून बनाने के लिए संसद को विशेष शक्तियां दी गई थीं, हटा दिया गया ।

44. संविधान (44वां संशोधन) अधिनियम, 1978- 

संपत्ति के अधिकार को, जिसके कारण संविधान में कई संशोधन करने पड़े, मूल अधिकार के रूप में हटाकर केवल विधिक अधिकार बना दिया गया । फिर भी यह सुनिश्चित किया गया कि संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों की सूची से हटाने से अल्पसंख्यकों के अपनी पसंद के शिक्षा संस्थानों की स्थापना करने और संचालन संबंधी अधिकारों पर कोई प्रभाव न पड़े । संविधान के अनुच्छेद-352 का संशोधन करके यह उपबंध किया गया कि आपात स्थिति की घोषणा के लिए एक कारण 'सशस्त्र विद्रोह' होगा । आंतरिक गडबडी, यदि यह सशस्त्र विद्रोह नहीं है तो आपात स्थिति की घोषणा के लिए आधार नहीं होगा । व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को जैसा कि अनुच्छेद-21 और 22 में दिया गया है, इस उपबंध द्वारा और अधिक शक्तिशाली बनाया गया है जिसके तहत् निवारक नजरबंदी कानून के अंतर्गत दो महीने से अधिक नज़रबंद नहीं किया जा सकता, जब तक कि सलाहकार बोर्ड यह रिपोर्ट नहीं देता कि ऐसी नज़रबंदी के पर्याप्त कारण हैं । इसके लिए अतिरिक्त संरक्षण की व्यवस्था इस अपेक्षा से की गई कि सलाहकार बोर्ड का अध्यक्ष किसी समुचित उच्च न्यायालय का सेवारत न्यायाधीश होगा और बोर्ड का गठन उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिशों के अनुसार किया जाएगा ।
विलंब से बचने के लिए अनुच्छेद-132 और 134 में संशोधन किया गया और एक नया अनुच्छेद-134क जोड़ा गया जिसके द्वारा यह उपबंध किया गया कि निर्णय, अंतिम आदेश अथवा सज़ा सुनाए जाने के तत्काल बाद संबंधित पक्ष के मौखिक आवेदन के आधार पर अथवा यदि उच्च न्यायालय उचित समझे तो स्वयं ही उच्चतम न्यायालय में अपील करने के लिए प्रमाण-पत्र मंजूर किए जाने पर विचार करे । इस अधिनियम द्वारा किए गए अन्य संशोधन मुख्य रूप से आंतरिक आपात स्थिति की अवधि के दौरान किए गए संशोधन के कारण संविधान में आई विकृतियों को दूर करने अथवा सुधार करने के लिए हैं ।


45. संविधान (45वां संशोधन) अधिनियम, 1980- 

यह अधिनियम संसद तथा राज्य विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और आंग्ल-भारतीयों के लिए स्थानों के आरक्षण संबंधी व्यवस्था को 10 वर्षों की अवधि के लिए और बढ़ाने के उद्देश्य से पारित किया गया ।

46. संविधान (46वां संशोधन) अधिनियम, 1982- 

इसके द्वारा अनुच्छेद-269 में संशोधन किया गया, ताकि अंतरराज्यीय व्यापार और वाणिज्य के दौरान भेजे जाने वाले सामान पर लगाया गया कर राज्यों को सौंप दिया जाए । इस अनुच्छेद का संशोधन इस दृष्टि से भी किया गया, ताकि संसद कानून द्वारा यह निर्धारित कर सके कि किस स्थिति में भेजा जाने वाला माल अंतरराज्यीय व्यापार या वाणिज्य के तहत् भेजा हुआ माना जाएगा । केंद्र सूची में एक नई प्रविष्टि 92 ख भी शामिल की गई, ताकि ऐसी स्थिति में जब माल अंतरराज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान भेजा जाए तो उस माल पर कर लगाया जा सके ।
अनुच्छेद-286 के खंड 3 का संशोधन किया गया, ताकि संसद कानून द्वारा कार्य-संविदा के निष्पादन के दौरान वस्तुओं के हस्तांतरण में, किराया-खरीद अथवा किस्तों में अदायगी के आधार पर माल की सुपुर्दगी पर कर लगाने की प्रणाली, दरों और अन्य बातों के संबंध में प्रतिबंध और शर्ते विनिर्दिष्ट कर सकें ।
'माल के क्रय और विक्रय पर कर' की परिभाषा में यह जोड़ने के लिए अनुच्छेद-366 का यथोचित संशोधन किया गया कि उसमें नियंत्रित वस्तुओं के प्रतिफलार्थ अंतरण, कार्य-संविदा के निष्पादन से संबंधित वस्तुओं के रूप में संपत्ति का अंतरण, किराया-खरीद अथवा किस्तों में अदायगी आदि की प्रणाली में माल की सुपुर्दगी को भी शामिल किया जा सके ।

47. संविधान (47वां संशोधन) अधिनियम, 1984- 

इस संशोधन का उद्देश्य संविधान की नवम अनुसूची में कतिपय भूमि सुधार अधिनियमों को शामिल करना है, ताकि उन अधिनियमों को लागू किए जाने में रुकावट डालने वाली मुकदमेबाजी को रोका जा सके ।

48. संविधान (48वां संशोधन) अधिनियम, 1984- 

संविधान के अनुच्छेद-356 के अधीन पंजाब राज्य के बारे में राष्ट्रपति द्वारा जारी की गई उद्घोषणा तब तक एक वर्ष से अधिक समय तक लागू नहीं रह सकती, जब तक कि उक्त अनुच्छेद-के खंड 5 में उल्लिखित शर्त पूरी नहीं होती। चूंकि यह महसूस किया गया है कि उक्त उद्घोषणा का लागू रहना आवश्यक है, इसलिए यह संशोधन किया गया है, ताकि इस मामले में अनुच्छेद-356 के खंड 5 में उल्लिखित शर्ते लागू न होने पाएं ।


49. संविधान (49वां संशोधन) अधिनियम, 1984- 

त्रिपुरा सरकार ने सिफ़ारिश की थी कि संविधान की छठी अनुसूची के उपबंधों को उस राज्य के जनजातीय क्षेत्रों में लागू किया जाए । इस अधिनियम द्वारा किए गए संशोधन का उद्देश्य राज्य में काम कर रही स्वायत्तशासी जिला परिषद को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करना है ।

50. संविधान (50वां संशोधन) अधिनियम, 1984- 

संविधान के अनुच्छेद-33 द्वारा संसद को यह निर्धारित करने के लिए कानून बनाने की शक्ति दी गई है कि संविधान के भाग 3 द्वारा प्रदत्त किसी अधिकारी को सशस्त्र सेनाओं अथवा लोक-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार बलों पर लागू करने में किस सीमा तक प्रतिबंधित अथवा निराकृत किया जाए, ताकि उनके द्वारा कर्तव्यों के उचित निर्वहन और उनमें अनुशासन बनाए रखने को सुनिश्चित किया जा सके ।
अनुच्छेद-33 की परिधि में निम्नलिखित बातों को लाने के लिए इसका संशोधन प्रस्तावित है:
(1) राज्य की अथवा उसके प्रभार या कब्जे में संपत्ति के संरक्षण के लिए प्रभारित बलों के सदस्य, अथवा
(2) आसूचना अथवा प्रति-आसूचना के प्रयोजन के लिए राज्य द्वारा स्थापित ब्यूरो अथवा अन्य संगठनों में नियुक्त व्यक्ति, अथवा
(3) किसी बल, ब्यूरो अथवा संगठन के प्रयोजन के लिए स्थापित दूरसंचार प्रणालियों में नियुक्त अथवा उनसे संबंधित व्यक्ति ।
अनुभव से पता चला है कि इनके द्वारा कर्तव्यों के उचित निर्वहन तथा उनमें अनुशासन बनाए रखने को सुनिश्चित्त करने की आवश्यकता राष्ट्रीय हित में अत्यंत महत्वपूर्ण है ।

51. संविधान (51वां संशोधन) अधिनियम, 1984- 

इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद-330 में संशोधन किया गया, ताकि मेघालय, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम की अनुसूचित जनजातियों के लिए संसद में स्थान सुरक्षित किए जा सकें । साथ ही साथ, स्थानीय जनजातियों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अनुच्छेद-332 में संशोधन करके नगालैंड और मेघालय की विधान सभाओं में भी इसी तरह का आरक्षण किया गया ।

52. संविधान (52वां संशोधन) अधिनियम, 1985- 

इस संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि यदि संसद-सदस्य या विधानसभा सदस्य दल-बदल करता है या उस दल द्वारा निकाल दिया जाता है, जिसने उसे चुनाव में खड़ा किया था, या कोई निर्दलीय उम्मीदवार जो चुने जाने के छह महीने के बाद किसी राजनीतिक दल का सदस्य बन जाता है, वह सदन का सदस्य होने के अयोग्य करार दिया जाएगा। इस अधिनियम में राजनीतिक दलों के विभाजन तथा विलय के संबंध में समुचित प्रावधान है ।

53. संविधान (53वां संशोधन) अधिनियम, 1986- 

यह भारत सरकार और मिज़ोरम सरकार द्वारा मिज़ोरम नेशनल फ्रंट के साथ 30 जून, 1986 को हुए मिज़ोरम समझौते को लागू करने के लिए बनाया गया है । इसके लिए नया अनुच्छेद-371-जी संविधान में जोड़ा गया है, जिसमें अन्य बातों के अलावा, मिज़ो लोगों के धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों, परंपरागत कानून और विधि के संबंध में संसद द्वारा कानून बनाने की मनाही, दीवानी तथा फ़ौजदारी संबंधी मामलों, जिन पर मिज़ो लोगों के परंपरागत कानून के अनुसार निर्णय लिया जाता है तथा जमीन के स्वामित्व और हस्तांतरण के बारे में भी तब तक संसदीय कानून लागू नहीं होगा जब तक मिज़ोरम की विधानसभा इसे मंजूरी नहीं दे देती । लेकिन यह धारा मिज़ोरम राज्य में संशोधन के जारी होने से पहले से लागू होने वाले केंद्रीय कानूनों पर लागू नहीं होगी । नई धारा में यह भी व्यवस्था है कि मिज़ोरम विधानसभा में कम-से-कम 40 सदस्य होंगे ।

54. संविधान (54वां संशोधन) अधिनियम, 1986- 

इस अधिनियम द्वारा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन को निम्न प्रकार से बढ़ाया गया है :
इस अधिनियम द्वारा द्वितीय अनुसूची के भाग 'घ' में संशोधन करके वेतन को उपर्युक्त प्रकार से बढ़ाया गया है तथा अनुच्छेद-125 एवं 221 में यह प्रावधान रखा गया है कि संसद कानून बनाकर भविष्य में न्यायाधीशों के वेतन में सुधार कर सकती है ।

55. संविधान (55वां संशोधन) अधिनियम, 1986- 

इसमें केंद्र शासित प्रदेश अरुणाचल प्रदेश को राज्य का दर्जा दिए जाने के भारत सरकार के प्रस्ताव को लागू किया गया है । इसके लिए संविधान में एक नया अनुच्छेद-371 एच जोड़ा गया है । अन्य बातों के अलावा, इस अनुच्छेद में अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल को प्रदेश की अत्यंत नाजुक स्थिति के कारण कानून और व्यवस्था के क्षेत्र में विशेष ज़िम्मेदारी सौंपी गई है । इसके अनुसार अपने दायित्वों को पूरा करने में राज्यपाल मंत्रिपरिषद में सलाह-मशविरा करके की जाने वाली कार्रवाई के बारे में अपना व्यक्तिगत निर्णय ले सकेंगे । यदि राष्ट्रपति चाहें तो राज्यपाल की यह ज़िम्मेदारी खत्म की जा सकेगी । नए अनुच्छेद के अनुसार यह भी व्यवस्था की गई है कि अरुणाचल प्रदेश राज्य की विधानसभा में 30 से कम सदस्य नहीं होंगे ।

56. संविधान (56वां संशोधन) अधिनियम, 1987- 

भारत सरकार के केंद्र शासित प्रदेश गोवा, दमन व दीव के गोवा जिले में शामिल क्षेत्र को गोवा राज्य के रूप में तथा उसी केंद्र शासित प्रदेश के दमन व दीव में शामिल क्षेत्र को दमन व दीव नामक एक नए केंद्र शासित प्रदेश के रूप में गठन का प्रस्ताव किया है । इस संदर्भ में यह प्रस्तावित किया गया कि नए राज्य गोवा की विधानसभा में 40 सदस्य होंगे । केंद्र शासित प्रदेश गोवा, दमन व दीव की मौजदा विधानसभा में 30 निर्वाचित सदस्य हैं तथा तीन मनोनीत सदस्य हैं । ऐसा विचार किया गया कि जब तक मौजूदा विधानसभा की पांच वर्ष की अवधि समाप्त होकर नए निर्वाचन न कर लिए जाएं, तब तक गोवा राज्य के लिए बनी नई विधानसभा में दमन व दीव का प्रतिनिधित्व करने वाले दो सदस्यों को शामिल न किया जाए । अतएव, नए राज्य गोवा को ऐसी विधानसभा देने का निश्चय किया गया, जिसमें 30 से कम सदस्य न हों। इस संशोधन ने उक्त प्रस्ताव को प्रभावी बनाने के लिए अपेक्षित विशेष प्रावधान को प्रभावी बनाया ।

57. संविधान (57वां संशोधन) अधिनियम, 1987- 

संविधान (51वां संशोधन) अधिनियम, 1984 लोकसभा में नगालैंड, मेघालय, मिज़ोरम और अरुणाचल प्रदेश की अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित करने तथा संविधान के अनुच्छेद-330 व 332 को समुचित प्रकार से संशोधित करके नगालैंड और मेघालय की विधान सभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित करने के लिए अधिनियमित किया गया था । यद्यपि ये क्षेत्र जनजाति-बहुल हैं, तथापि इस संशोधन का उद्देश्य यह था कि इस क्षेत्र में रहने वाली जनजातियां अपना न्यूनतम प्रतिनिधित्व तो कर ही सकें, क्योंकि वे विकसित वर्ग के लोगों के साथ चुनाव लड़ने में सक्षम नहीं हैं । यद्यपि संविधान (51वां संशोधन) अधिनियम औपचारिक रूप से प्रभावी था, फिर भी यह पूरी तरह से तब तक लागू नहीं हो सकता था, जब तक यह निर्धारित न हो जाए कि इन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के लिए किन-किन स्थानों का आरक्षण करना है । किसी भी राज्य में अनुसूचित जाति व जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण संविधान के अनुच्छेद-332 के अंतर्गत संविधान के अनुच्छेद-332(3) के प्रावधानों को ध्यान में रखकर ही निर्धारित किया जाता है, किंतु उत्तर-पूर्वी राज्यों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखते हुए, इन राज्यों की अनुसूचित जनजातियों के विकास व अन्य संबंधित बातों पर विचार करके यह जरूरी समझा गया कि इन क्षेत्रों में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण के लिए विशेष प्रावधान किए जाएं, ताकि ये लोग भी, जैसा कि संविधान में संकल्पना की गई है, सामान्य जीवन व्यतीत कर सकें। संविधान के अनुच्छेद-332 को अस्थाई प्रावधान बनाने के लिए फिर से संशोधित किया गया, जिससे अनुच्छेद-170 के अंतर्गत वर्ष 2000 के बाद पहली जनगणना के आधार पर अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण का पुनः निर्धारण किया जा सके । इस संशोधन में यह इच्छा व्यक्त की गई कि यदि ऐसे राज्यों की विधान सभाओं (जो संशोधित अधिनियम के लागू होने की तिथि पर अस्तित्व में थीं) में सभी स्थान अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों द्वारा अधिग्रहीत किए गए हों, तो एक को छोड़कर सभी स्थान अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित किए जाएं तथा अन्य किसी मामले में जहां पर स्थानों की संख्या कुल संख्या के बराबर हो, एक ऐसा अनुपात हो जिसमें मौजूदा विधानसभा के सदस्यों की संख्या मौजूदा विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के बराबर हो । यह अधिनियम इन उद्देश्यों को प्राप्त करता है ।

58. संविधान (58वां संशोधन) अधिनियम, 1987- 

हिंदी में संविधान के प्राधिकृत पाठ के प्रकाशन की मांग सामान्यतः रही है । विधि प्रक्रिया में संविधान का आसानी से प्रयोग किया जा सके, इसके लिए आवश्यक है कि इसका हिंदी पाठ भी प्राधिकृत हो । संविधान का कोई भी हिंदी संस्करण न केवल संवैधानिक सभा द्वारा प्रकाशित हिंदी अनुवाद के अनुरूप हो, बल्कि हिंदी में केंद्रीय अधिनियमों के प्राधिकृत पाठों की भाषा, शैली व शब्दावली के भी अनुरूप हो । संविधान को संशोधित करके राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान की गई है कि वह अपने प्राधिकार के तहत् संविधान के हिंदी अनुवाद को, जिस पर संवैधानिक सभा के सदस्यों ने अपने हस्ताक्षर किए हुए हैं तथा जिनमें उन सभी परिवर्तनों को शामिल कर लिया गया है जिससे यह हिंदी भाषा के केंद्रीय अधिनियमों के प्राधिकृत पाठों की भाषा, शैली व शब्दावली के अनुरूप हो, प्रकाशित करा सकें । राष्ट्रपति को यह शक्ति भी प्रदत्त की गई है कि वह संविधान में किए गए प्रत्येक अंग्रेज़ी संशोधन का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करवाएं ।

59. संविधान (59वां संशोधन) अधिनियम, 1988- 

इस अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद-356 (5) का संशोधन किया गया, जिससे कि अनुच्छेद-356 के खंड (1) के अधीन राष्ट्रपति की उद्घोषणा का एक वर्ष की अवधि से आगे विस्तार किया जा सके और यदि आवश्यक हो तो पंजाब राज्य में अशांति की स्थिति बनी रहने के कारण अनुच्छेद-356 के खंड (4) के अधीन यथा अनुज्ञेय तीन वर्ष की अवधि तक प्रभावी बनाया जा सके । इस अधिनियम द्वारा आपात स्थिति की उद्घोषणा से संबंधित संविधान के अनुच्छेद-352 का, पंजाब राज्य में इसे लागू किए जाने की बाबत संशोधन किया गया है जिसके अनुसार आंतरिक गड़बड़ी को पंजाब में आपातस्थिति की उद्घोषणा हेतु एक आधार बनाया गया है । अनुच्छेद 352 में संशोधन किए जाने के परिणामस्वरूप, पंजाब राज्य के संबंध में अनुच्छेद-358 और 359 के संशोधन की तारीख 30 मार्च, 1988 से जो इस संशोधन के प्रारंभ की तारीख है, दो वर्ष की अवधि के लिए ही प्रवर्तनीय रहेंगे ।

60. संविधान (60वां संशोधन) अधिनियम, 1988-   

अधिनियम, संविधान के अनुच्छेद-276 के खंड (2) का इस दृष्टि से संशोधन करता है, जिससे कि व्यवसायों, व्यापारों, आजीविकाओं और नियोजनों पर कर की अधिकतम सीमा को 250 रुपये प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 2,500 रुपये प्रतिवर्ष किया जा सके। इस कर में वृद्धि करने से राज्यों को अतिरिक्त स्रोत जुटाने में सहायता मिलेगी। धारा (2) के उपबंध का लोप किया गया है ।

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